"बिभक्ति के नियम"
( 1 ) 2 से बिभक्ति के नियम - यदि किसी संख्या का इकाई अंक 0 , 2 , 4 , 6 , 8 में से कोई हो तो वह संख्या 2 से पूर्णतः बिभक्त होगी।
( 2 ) 3 से बिभक्ति का नियम - यदि दी गई संख्या के सभी अंकों का योग 3 से बिभक्त हो जाए , तो वह संख्या 3 से पूर्णतः बिभक्त होगी।
( 3 ) 4 से बिभक्ति का नियम - कोई दी गई संख्या 4 से तभी बिभक्त होगी जब उस संख्या के दहाई और इकाई अंकों से बनी संख्या 4 से बिभक्त हो।
उदाहरण के लिए - 251632 ( यह संख्या 4 से पूर्णतः बिभक्त होगी )
( 4 ) 5 से बिभक्त होने का नियम - यदि दी गई संख्या का इकाई अंक 5 तथा 0 हो तो वह संख्या 5 से बिभक्त होगी।
( 5 ) 6 से बिभक्त होने का नियम - दी गई संख्या का इकाई अंक सम हो तथा संख्या के अंकों का योग 3 से बिभक्त हो।
( 6 ) 7 से बिभक्ति का नियम - यदि इकाई अंक को छोड़कर शेष बची संख्या में से इकाई अंक का दुगुना घटाने पर प्राप्त संख्या 7 से बिभाजित हो तो दी गई संख्या 7 से पूर्णतः बिभाजित होगी।
( 7 ) 8 से बिभक्त होने का नियम - दी गई संख्या 8 से तभी पूर्णतः बिभक्त होगी जब संख्या के अंतिम 3 अंक 8 से बिभाजित हों।
उदाहरण के लिए - 2513264 ( यह संख्या 8 से बिभक्त होगी )
( 8 ) 9 से बिभक्त होने का नियम - दी गई संख्या 9 से तभी बिभक्त होगी जब उनके अंकों का योग 9 से पूर्णतः बिभक्त हो।
( 9 ) 11 से बिभक्त होने का नियम - कोई दी गई संख्या 11 से तभी बिभक्त होगी। जब इकाई से बांई ओर चलने पर "सम स्थानों" के अंकों का योग तथा "बिषम स्थानों" के अंकों के योग का अंतर 0 हो या 11 से बिभक्त हो , तो वह संख्या 11 से पूर्णतः बिभाजित हो जायेगी।

सम संख्याएँ ( Even number ) - जो प्राकृत संख्याएँ 2 से पूर्णतः बिभजित हो जाएँ सम संख्याएँ कहलाती हैं।
बिषम संख्याएँ ( odd number ) - जो प्राकृत संख्या 2 से बिभक्त न हो बिषम संख्या कहलाती है।
अभाज्य संख्याएँ ( Prime number ) - ऐसी प्राकृत संख्याएँ जिनके केवल दो गुणनखंड हों ( अर्थात जो स्वयं और 1 के अतिरिक्त किसी अन्य संख्या से बिभाजित न हो ) अभाज्य संख्याये कहलाती हैं।
प्राकृत संख्याएँ - 1 , 2 , 3 , 4 , 5 , ............., अनंत तक।
a = भाज्य ( Dividend )
b = भाजक ( Divisor )
q = भागफल ( Quotient )
r = शेषफल ( Remainder )

"समान्तर श्रेणी"
वह श्रेणी जिसमें पदों का अंतर समान होता है।
a , a+d , a+2d , ................... n
जहाँ a = प्रथम पद
d = सार्वनुपात
n वां पद Tn = a+(n-1)d
{ d = द्वितीय पद - प्रथम पद }
n पदों का योग Sn = n/2[ 2a+(n-1)d ]
अंतिम पद दिया हो तब ,
n पदों का योग = n/2 ( a+l )
{ जहाँ l = अंतिम पद है }

"गुणोत्तर श्रेणी"
आपके लिए एक प्रश्न - 2+0.2+0.02+0.002+.............+S8 = ?

जिन संख्याओं का पूरा वर्गमूल और घनमूल नहीं आता है , वे सभी अपरिमेय संख्याएँ होती हैं।
π एक अपरिमेय संख्या है।

"अभाज्य संख्या ज्ञात करना"
5 या 5 से बड़ी अभाज्य संख्याओं में 6 से भाग देने पर शेषफल हमेशा 1 या 5 प्राप्त होगा।

"इकाई अंक ज्ञात करना"
यदि किसी संख्या का इकाई अंक 0 , 1 , 5 , 6 है , तो उस पर घात कुछ भी हो इकाई अंक वही होता है।
कुछ अन्य बिंदु :
( 1 ) यदि 4 की घात सम है तो इकाई अंक 6 होगा।
( 2 ) यदि 4 की घात बिषम है , तो इकाई अंक 4 होगा।
( 3 ) यदि 9 की घात सम है , तो इकाई अंक 1 होगा।
( 4 ) यदि 9 की घात बिषम है , तो इकाई अंक 9 होगा।

"दशमलव भिन्न"
ऐसी भिन्न जिसका हर 10 की घात में हो , दशमलव भिन्न कहलाती है।
( 1 ) दशमलव भिन्न को साधारण भिन्न में बदलने के लिए भिन्न को अंश में बिना दशमलव बिंदु के लिखते हैं तथा हर में दशमलव बिंदु के नीचे 1 के साथ उतने शून्य लगाते हैं जितने दशमलव बिंदु के बाद के अंक हैं।
( 2 ) यदि किसी भिन्न के अंश तथा हर में दशमलव स्थानों की संख्या समान हो तो , हम अंश तथा हर में से दशमलव बिंदु हटा देते हैं।
( 3 ) दशमलव भिन्नों का गुणा करना - दी गई संख्याओं का बिना दशमलव बिंदु के गुणा कर लेते हैं , गुणनफल में दशमलव उतने ही स्थानों पर लेते हैं जितना दी गई भिन्नों के दशमलव के स्थानों का योग है।
( 4 ) दशमलव भिन्नों का भाग देना - भाज्य तथा भाजक को 10 की ऐसी घात से गुणा करें , कि भाजक एक पूर्णांक बन जाए।

"घातांक तथा करणी"
( 2 ) जब घात को दूसरी तरफ ले जाते हैं , तो उलटी होकर लग जाती है।
घातांक और करणी के नियम :
